Friday, July 19, 2024
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सूरज की पहली किरण पड़ने वाला चांदसूरज विकास से कोसो दूर

सरकारी योजनाओं से वंचित : पूरा आदिवासी बहुल गांव
गोंदिया. छत्तीसगढ़ राज्य से महाराष्ट्र में प्रवेश करते समय दोनों राज्यों की सीमा पर गोंदिया जिले का एक गांव है. जैसा कि गांव के नाम से पता चलता है, सूरज की पहली किरणें भी इसी गांव में पड़ती हैं. जिला मुख्यालय से 75 किमी दूर स्थित यह गांव पूरी तरह से आदिवासियों से बसा हुआ है. लेकिन इस गांव तक अब तक विकास योजनाएं नहीं पहुंच सकी हैं. नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सरकारी व प्रशासनिक व्यवस्था भी वहां नहीं जाती है.
छत्तीसगढ़ राज्य की शुरुआत चंदसूरज गांव से पूर्व में होती है. तो महाराष्ट्र राज्य की शुरुआत इसी गांव से हुई. यह क्षेत्र वनाच्छादित है. छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में स्थित यह क्षेत्र बहुत घने जंगल से घिरा हुआ है. इसलिए इस क्षेत्र में नक्सली भी सक्रिय हैं. चांदसूरज गांव मुख्य रूप से आदिवासियों द्वारा बसा हुआ है. इस गांव में करीब 80 घर हैं और आबादी 500 के करीब है. धुरगोंडी और राजगोंडी यहां की मूल भाषाएं हैं. यह गांव जिला मुख्यालय से महज 70 किमी दूर है. सूरज उगने के बाद सूरज की पहली किरण महाराष्ट्र के इस गांव में पड़ती है. उसके बाद राज्य में सूर्योदय हो जाता है. यह गांव राज्य के पूर्वी छोर का पहला गांव है. लेकिन यह गांव छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र को जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित है. फिर भी गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. आदिवासी भाषाओं के अलावा यहां सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है. इसलिए जिला परिषद की ओर से यहां एक हिंदी विद्यालय शुरू किया गया है. यह गांव दो पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है. अत: यहां कोई समतल क्षेत्र नहीं है तथा वन क्षेत्र होने के कारण अधिक कृषि नहीं होती है. उस समतल भूमि पर चावल की खेती होती है. खेती के अलावा यहां आय का कोई दूसरा जरिया नहीं है. इसलिए यहां के नागरिकों का पांचवां हिस्सा बेरोजगारी का है. यह गांव टोयागोंदी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है. टोयागोंदी ग्राम पंचायत के अंतर्गत विचारपुर, चांदसूरज, चौकीटोला, कोपालगढ़, टबरूटोला, बरटोला, दलाटोला आदि गांव शामिल हैं. गांव में केवल चौथी कक्षा तक ही शिक्षा की सुविधा है. आगे की पढ़ाई के लिए पास में ही विचारपुर जाना पड़ता है. 7वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए बदटोला और दर्रेकसा व सालेकसा जाना पड़ता है. सड़क, नाली, बिजली आदि की समस्या अब भी बनी हुई है. इसी तरह आदिवासी, पहाड़ी क्षेत्र और नक्सल संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण प्रशासन के अधिकारी भी यहां नहीं जाते हैं. कभी कबार ही इस गांव में जनप्रतिनिधियों कदम रखते है. परिणामस्वरूप यह हुआ कि यह गांव कई पीढ़ियों से विकास से कोसो दूर है. इस गांव के लोग सरपंच को नेता के रूप में जानते हैं. सरकार और प्रशासन कितना भी चिल्ला ले कि पिछड़े इलाकों का विकास किया जा रहा है, लेकिन चांदसूरज के इस गांव में आने के बाद सरकार और प्रशासन के दावे खोखले हो जाते हैं.

उम्मीद अब भी
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर जमीन में एक पत्थर का खंभा गाड़ा गया है. उस पत्थर पर चंद्रमा और सूर्य का चित्रण किया गया है. अनुमान लगाया जा रहा है कि उसी से इस गांव का नाम चांदसूरज पड़ा होगा. इस गांव के लोग आज भी विकास की आस लगाए बैठे हैं. उनका मानना है कि कोई उद्धारकर्ता आएगा और गांव में विकास योजनाएं लाएगा.

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