पंकज रहांगडाले की पहल पर गोंदिया जिले के आंगनवाड़ी में नर्सरी से केजी तक शिक्षा का नवाचारी प्रयोग सफल

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सामान्य सभा में होगा निर्णय : विद्यार्थियों को मिलेगी समान शिक्षा का अवसर
गोंदिया. आंगनवाड़ी में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा देते समय उनकी बौद्धिक क्षमता को ध्यान में रखकर शिक्षा की पद्धति बदलने का एक नवाचारी प्रयोग गोंदिया जिला परिषद के पूर्व अध्यक्ष पंकज रहांगडाले ने अपने गांव तुमखेड़ा बु. में शुरू किया है. इस प्रयोग की सफलता के आधार पर उन्होंने यह मांग की है कि यह उपक्रम जिले के हर तहसील में कम से कम 10 आंगनवाड़ियों में प्रायोगिक रूप से शुरू किया जाए. यह मांग उन्होंने जिला परिषद की स्थायी समिति की बैठक में रखी, जिसे जिला परिषद अध्यक्ष लायकराम भेंडारकर और उपाध्यक्ष सुरेश हर्षे ने स्वीकृति दी है और आगामी सामान्य सभा में इसे मंजूरी देने का आश्वासन दिया है. आंगनवाड़ी में आने वाले बच्चों की उम्र और बौद्धिक क्षमता अलग-अलग होती है. सक्षम माता-पिता अपने बच्चों को नर्सरी, केजी-1 और केजी-2 में पढ़ाते हैं और फिर पहली कक्षा में उनका दाखिला होता है. लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे तब तक आंगनवाड़ी में रहते हैं जब तक वे पहली कक्षा के लायक नहीं हो जाते. जब ये बच्चे स्कूल जाते हैं, तो उन्हें अन्य बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और वे पीछे रह जाते हैं. इस समस्या के समाधान के लिए पंकज रहांगडाले ने गांववासियों के सहयोग से तुमखेड़ा बु. में एक अनोखा प्रयोग शुरू किया. इसमें बच्चों को उम्र के अनुसार तीन समूहों में बांटा गया. नर्सरी, केजी-1 और केजी-2। प्रत्येक समूह के लिए उपयुक्त पुस्तकें और शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई गई. इससे ये बच्चे जब पहली कक्षा में जाएंगे, तो निजी स्कूलों के बच्चों के साथ आसानी से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे, ऐसा विश्वास रहांगडाले ने जताया. इस प्रयोग की सफलता को देखते हुए रहांगडाले ने स्थायी समिति की बैठक में इस पहल को जिले में फैलाने की मांग की. उन्होंने कहा, प्रायोगिक रूप से हर तालुका की कम से कम 10 आंगनवाड़ियों में यह प्रयोग लागू किया जाए और उसका अध्ययन कर पूरे जिले में इसे लागू किया जाए. इस प्रस्ताव पर अध्यक्ष भेंडारकर और उपाध्यक्ष हर्षे ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और इसे सामान्य सभा में मंजूरी देने की बात कही. पंकज रहांगडाले ने पूर्व में भी जिला परिषद के अध्यक्ष पद पर रहते हुए कई लोकहितकारी निर्णय लिए हैं. इस नई पहल से छात्रों के प्रति उनका स्नेह और शिक्षा के प्रति उनकी संवेदनशीलता स्पष्ट होती है. यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है, ऐसी उम्मीद जताई जा रही है.

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