सारस संरक्षण के लिए 18 वर्षों का संघर्ष

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78 गांवों में युवाओं की गश्त
गोंदिया. प्रकृति के शर्मीले और किसानों के कैवरी पक्षी माने जाने वाले सारस की संख्या दिन-ब-दिन कम होती जा रही है. इसलिए जिले के कुछ समझदार युवाओं ने इनकी सुरक्षा का जिम्मा उठाया है. इन युवाओं ने तीन जिलों गोंदिया, बालाघाट और भंडारा के ‘सारस स्कैप’ के 78 गांवों में सारस बचाव के लिए एक सेवा संगठन बनाया. इस संगठन के माध्यम से सदस्यों ने गांवों के नागरिकों के लिए सारस के संरक्षण के लिए एक जन आंदोलन शुरू किया है.
महाराष्ट्र में सारस केवल गोंदिया जिले में ही देखे जा सकते हैं. सारस की संख्या जो 18 वर्ष पहले न्यूनतम थी, अब पर्याप्त है. गोंदिया, भंडारा और मध्यप्रदेश के बालाघाट जिलों में सारस की संख्या वर्तमान में 80 से 85 के बीच है. क्योंकि सारस का निवास स्थान इन तीन जिलों में है, इसलिए सेवा संगठन के युवा समय-समय पर गांवों में पहुंचकर इन गांवों के लोगों को सारस के महत्व और उनके संरक्षण के बारे में समझा रहे हैं. पिछले नौ वर्षों से सेवा संस्था के निरंतर कार्य से अब गांवों में सारस संरक्षण का बीड़ा लोगों ने उठाया है. सेवा संस्थान के अध्यक्ष सावन बहेकर, मुनेश गौतम, अभिजीत परिहार, अभय कोचर, भरत जसानी, मुकुंद धुर्वे, दुष्यंत रेभे, अंकित ठाकुर, प्रशांत लाडेकर, बबलू चुटे, राकेश डोये, दुष्यंत आकरे, अशोक पडोले, डेलेंद्र हरिनखेड़े, प्रवीण मेंढे, जलाराम बुधेवार, विशाल कटरे, कन्हैया उदापुरे, मोहन राणा, सलीम शेख, पिंटू वंजारी, रतिराम क्षीरसागर, रुचिर देशमुख, अश्विनी पटेल, राजसिंह बिसेन, सिकंदर मिश्रा, निशांत देशमुख, कलमेश कांबले, राहुल भावे, हरगोविंद टेंभरे, जयपाल ठाकुर , विकास फरकुंडे, विकास महारवाड़े, राहुल भावे, जयु खरकाटे, रमेश नागरीकर, पवन सोयाम, शेरबहादुर कटरे, चंदनलाल रहांगडाले, हिमांशु गायधने, संजय भांडारकर, अनुराग शुक्ला इस सारस को बचाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. इसलिए यह सारस संरक्षण में योगदान दे रहा है.

सरकार व प्रशासन की अनदेखी
सारस को बचाने के लिए सेवा संस्था की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन अगर इनके काम को सरकार के काम के साथ जोड़ दिया जाए तो सारस के संरक्षण में जोरदार मदद मिलेगी. जिस सारस ने गोंदिया का नाम देश स्तर ऊंचा उठाया उस सारस को शासन-प्रशासन कुछ हद तक नजरअंदाज कर रहा है. सारस के संरक्षण के लिए अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.

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